Saturday, January 28, 2012

बाप...

जब कभी कोई बाप अपने बेटे को फ़ोन करता है....
तो कुछ बेमानी से सवाल करता है...
जिनका एक सा ही जवाब होता है...
पर असल में आवाज़ की गहराई नापता है अपनी औलाद की..
न जाने कैसे बस आवाज़ से ही हर चीज़ का इल्म है हर बाप को...
शायद जब पैदा किया था तो अपनी रूह का एक हिस्सा काट के...
माँ की कोख में रख दिया हो...

नासूर...

कुछ रिश्ते वक़्त की राह पे चलते चलते नासूर बन जाते है...
बिन माँ बाप के बच्चों की तरह पेश आते है...
चीखते है, चिल्लाते है, आदम खोर बन जाते है....
कुछ दिन तो शांत रहता ऐसा रिश्ता जिस्म में...
पर कुछ रोज़ बाद जिस्म के बाहर बदन पे फोड़ा बन के बाहर आता है..
उस 'allergy' की तरह जो बार बार आती है...
बोहोत कोशिश करने के बाद काबू में आते है...
किसी बिगड़े हुए हाथी की तरह...
तेरे रिश्ते को मैंने ज़हन के एक कोने में...
ज़ब्त की जंजीरों में बाँध के रखा है...
जैसे किसी पागल को बाँध के रखते है....
और तेरा जमाल भी कमाल है...
हर रोज़ वोह रिश्ता साबित करने की कोशिश करता है के मै पागल नहीं हूँ...
और रोज़ उसे में एक 'injection' देके सुला देता हूँ...

Monday, January 23, 2012

बेमानी...

खोकला सा इश्क पनपता है आज कल
सतह पर रोशन पर अन्दर से घना अँधेरा है....
कोई किसी से प्यार करे तो 'they are going around'...
पहले इश्क में 'going around' होता था अब going around में इश्क ढूँढ़ते है...
कुछ साल पहले न जाने कितने लक़ब देते थे एक दुसरे को ...
अब 'dude' और 'honey' में ही नाम ख़तम हो जाते है....
जो पहले ख़त लिखा करते थे प्यार भरे...
आज कल चंद बेमानी से 'sms' में बट जाते है...
शायद इसी लिए पोस्ट ऑफिस में तन्हाई गूंजती है...
साहिल पे अक्सर हसीन जिंदगी की तामीर किया करते थे लोग...
अब किसी 'cafe' में बैठ के 'weekend planning' करते है....
पहले बरसात होती थी तो चाय के साथ कोई खूबसूरत गीत होता था 'balcony' में...
आज दो कॉफ़ी के कप बात करते है और खामोशी बेचैन रहती है....
हर कोई जैसे अपनी असलियत छुपा के चल रहा है...
जिस दिन सामने आ गई उस दिन 'breakup' हो जाता है...
न जाने कहा खो गया सा है इश्क...
जजबात तो आज भी वही है...
जरा जाके कोई समझाए इश्क के मानी क्या है...
पर कोई सुनेगा???
सभी है घाफिल ज़िन्दगी के जिंदा होने पर....







Sunday, January 22, 2012

ग़ज़ल...

जजबात की रीया शक्ल लगा के घुमते है लोग...
रिश्ते नहीं बस कुछ देर साथ निभाते है लोग...

हर बात छुपा ली है सबने अपने बारे में...
सिर्फ अपने ही अन्दर जीते मरते है लोग...

खुद ही समझा रखा है ज़हन को दुनिया के बारे में...
रूह को जंजीरों में बाँध के रखते है लोग...
 
इश्क तो तेरा अल्लाह पाक सा था 'पराशर'...
कमबख्त इश्क के नाम पे जी बहला लेते है लोग...





Wednesday, November 30, 2011

त्रिवेणी...

न जाने किसकी दुआओं का असर है...
जिंदगी बदली बदली सी हसीन नज़र आती है...

लोगो ने तुझे मसजिद की तरफ जाते देखा था....

मुक्ति...

न जाने कब से सफ़र कर रहा हूँ इस धरती पर...
हर मंज़र जैसे देखा देखा सा लगता है...
हर रिश्ता आजमाया सा लगता है...
चाँद सितारे देखता हूँ तो 'deja vu' सा होता है...
हर शक्स जिससे मिलाता हूँ जैसे मेरा हमसफ़र था कभी...
वजूद की गहराई में कितने सवाल है...
हर रोज़ उनका जवाब ढूँढता रहता हूँ...
न जाने कितने जिस्मों से हो कर निकली है रूह मेरी...
आँख बंद करता हूँ तो चीखे आती है अन्दर से...
कभी लगता है सब कुछ है अन्दर मेरे..
कभी एक खला सी लगाती है...
क्या मुझे पाना है? मै कौन हूँ? किस लिए हूँ यहाँ? ...
इन्ही सवालों का जवाब पाना ही शायद जिंदगी है...
पर इसकी इन्तहा कहाँ है??
तुझ से मिलाता हूँ तो  एक सुकून सा दौड़ता है रूह में...
जैसे समंदर किनारे शफक उतरे...
और इस अनजान सफ़र का अंजाम नज़र आता है...

आ चल मेरे साथ के मुक्त हो जाए इस सफ़र से...
सुना है उस पार एक और धरती है...

Sunday, October 9, 2011

आज का दिन...

आज का दिन बड़ा ही दिलशाद था... गुजरा तो मैंने महफूज़ करके रख लिया...
सोचा जब कोई उदास दिन आएगा तो अपने आँगन में इसे खोल दूंगा...
सुबह की सुनहरी धुप जैसे जिस्म में घुल कर रूह को छु रही थी...
नज़र बड़ी ही मेहरबान थी.. गोया सुकून बाँट रही हो....
ज़हन में ऐसे अरमान आ रहे थे.. जैसे कोई नयी ज़िन्दगी का आघाज़ करे...
दोपहर आई तो तुम्हारे दामन से लिपट के बैठ गयी मेरे आँगन में...
और धीरे धीरे शाम की तरफ उसको सिसकते देखा था तुम्हारे बदन पर...
इससे पहले इतनी ज़ेबा दोपहर देखि न थी...
शाम की रानाई को देख कर यूँ लगा के सितारों का मुशायरा लगा है...
और रात की खामोशी में तुम्हारी सरगोशी को सुन कर...
रात को एक ठंडी आह भरते देखा था मैंने... 

आज का दिन बरकतों का दिन था..
आज का दिन तेरे संग गुजरा था...



शबाना आज़मी के लिए...

शब् भी ढूँढती है मिलने का तुमसे बहाना...
सहर महफूज़ है इन परीजाद आँखों में...
कैफ़ी की कैफियत है इनमे...
और लफ्ज़-ए-जावेद-ए-नूर का ठिकाना....

याद रहेगी वोह शाम शायराना...
जब मिले थे जावेद, कैफ़ी और शबाना...

Saturday, September 24, 2011

ग़ज़ल...

हुस्न-ए-हर्फ़ छेड़ ऐ साकी, अक्ल की बात न कर,
जमाल-ए-महताब छाने दे, हिसाब की बात न कर..

मत सिखा मुझे तू नाज़ुक लहजे, प्यारी बातें,
दिल का पाक हूँ मै, रिया की बात न कर...

धड़कता है दिल मेरा तंग्दस्तों के लिए...
उनकी मुस्कान मेरा सरमाया है, सूद-ओ-जिया की बात न कर...

कहता है तू मुझे दीवाना उसका,
इश्क किया है मैंने इबादत की तरह, बेतरतीबी की बात न कर..

सोचता है तू किस कदर लाइल्म हूँ मै...
खुदा की राह पे चलता है  'पराशर', समाज की बात न कर... 

नज़्म...

एक नज़्म खो गयी है मेरी... 
मैंने लिख के रख दी थी कहीं...
धुंदली धुंदली याद आती है... अधूरी अधूरी सुनाई देती है...
किसीने चुरा ली है शायद... 
तेरा ज़िक्र था उसमे और खुशबू थी तुम्हारी आवाज़ की.. 
यादों के लिफाफों को खोल के देखा पर कहीं उसकी आहट नहीं थी...
किताबों की गलियों से गुज़रा तो पैरों के निशान तक नहीं थे....
बूढी हो गई थी, कुछ ही साल जिंदा रहती...
पर न जाने क्यों आज जेहेन के दरीचों से झांकती है...
ज्यादा गेहरा रिश्ता नहीं था उसके साथ...
पर आज जो बिछड़ा  हूँ  तो एक खलिश सी उभरी है दिल में...
हवाओं की तलाशी ली, खामोशी की छान बीन की...
अंधेरों से पूछा, उजालों को टटोल के देखा...
न जाने कहाँ खो गयी है...
फिर कल शब् जब तुम्हारे पास बैठा था...
तो तुम्हारे होटों पर छुप के बैठी थी वोह नज़्म...

इससे बेहतर भी उसका ठिकाना क्या होता..
मेरी हर नज़्म की इब्तेदा और इन्तहा तुम्ही से है.....

Tuesday, August 2, 2011

मुस्कुराहट....

मेरी  सोसाइटी  के  'basement' में  एक  छोटा  सा  परिवार  काम  करता  है...
मिया  बीवी  है  और  एक  बच्चा  जो  कभी  काम  में  हात  बटाता  तो  कभी  बोझ  लगता  है...
लोगो  के  कपड़ों  पर  जो  दौलत  और  शोहोरत  का  मैल  जम  जाता  है...
उसको  साफ़  करके  फिर  मैल चढाने  के  काबिल  बनाता  था  वोह  परिवार...
न  'career' की  महत्वकांक्षा  थी  न  इज्जत  का  खोकला  गुरुर...
पर  जब  भी  मिलते  थे  मुस्कुराते  थे  जैसे  खुदा  मुस्कुराता  है  बन्दों  पे...
दिन  भर  काम  करने  के  बाद,  बीवी  शाम  को  हर  घर  के  हिस्से  के  कपडे  देने  जाती  है...
जैसे  लोग  कोई  बड़े  हवन  पूजा  के  बाद  प्रशाद  बाटते  है...
सारे  बच्चे  किसी  सस्ते  खिलोने  की  तरह  देखते  थे  उस  बच्चे  की  तरफ...
पर  फिर  भी  घुल  मिल  के  खेलता  था  सब  के  बिच...
अभी  तक  उसने  औकाद  के  हिसाब  से  दोस्त  बनाना  सीखा  नहीं  था...
हर  रोज़  रात  को  घरों  से  बचा  हुआ  खाना  लेके  घर  को  लौटते  थे...
और  लौटते  हुए  अक्सर  मैंने  तीनो  को  एकसाथ  मुस्कुराते  हुए  देखा  है..
इस   उम्मीद   में  के  किसी  दिन  जिंदगी  हसीन  होगी 
जहां  बाकी  घरों  में  काम  के  बोझ  और  खोकले  रिश्ते  सांस  लेते  है...
कम  दीखते  है  ऐसे  लोग  जिनके  हालात  मजबूर  न  होके  खुद्दार  है...
दौलत  से  कमजोर  पर  मुस्कुराहट  और  उम्मीद  से  मजबूत..
जिंदगी  इतनी  भी  मुश्किल  नहीं  मुस्कुराने  को..
रूह  इतनी  भी  कम्जोर  नहीं  मर  जाने  को..

Monday, August 1, 2011

बारिश...

सुबह से एक काला बादल मेरा पीछा कर रहा था...
पीछा करते करते मेरे घर की खिड़की पे आके रुक गया...
किसी कुत्ते के पिल्ले की तरह जो अपनी माँ से बिछड़ गया हो...
न जाने क्या आरज़ू थी उसकी बड़ी आस लगा के ताकता रहा मुझको...
फिर एक हवा का झोंका आके मेरे कानो में चुपके से कह गया...
सावन का भटका बादल है उसे अपनी मंजिल तक पहुंचा दो...
फिर जब हवाओं पे पैर रखकर शाम उतरी...
तो मेरी हैरत की निगाह जो उस बादल पर थी मददगार हो उठी...
हवाओं के हाथों संदेसा भिजवाया उस बादल को...
की मेरे पीछे पीछे चलता रहे...
फिर जब चाँद निकला गोधुली में...
तो उस बादल को तेरे घर के ऊपर छोड़ आया था....
हर बादल की ख्वाहिश रहती थी तेरी छत पे बरसने की...
सुना है कल रात बारिश हुई थी सिर्फ तेरे ही घर पर जब तुम मुस्कुराती आँगन में आई थी...
खुदा का कोई करिश्मा समज कर लोगो ने शाम की नमाज़ तेरे दर पे ही अदा करदी...
बारिश भी दीवानी है तेरी...
बादलों का कम्बल ओढ़े किसी डाकू की तरह तुझे मुस्कुराता देखने चली आती है सावन में...


सावन...

कल रात के आखरी पहर में  दरवाज़े पे हुई दस्तक ने अचानक जगा दिया...
हवा का झोंका था जो दरवाज़े पे कुछ सब्ज़ पानी की बूँदें फ़ेंक गया था..

सुबह उठ के 'calendar' देखा तो सावन का महिना शुरू हो चूका था.... 

India Pakistan

अगर  इंडिया  और  पकिस्तान  आज  एक  होते..
तो  सचिन  तेंदुलकर  और  वसीम  अकरम  एक  ही  टीम  में  होते..
क्या  टीम  होती  वह  हर  विश्वकप  हम  ही  जीतते...
कश्मीर  की  पेशानी  पे  इतनी  चोटे  नहीं  होती...
हिन्दू  और  मुसलमानों  के  बदन  से  कॉमि  बदबू  नहीं  आती...
उर्दू  आज  भी  स्कूलों  में  पढाई  जाती...
'Bangalore' के  साथ  साथ  इस्लामाबाद  भी  'IT' में  आगे  होता..
न  टूटती  बाबरी  न  गोधरा  में  दंगा  भड़कता...
आतंकवादियों  से  ज्यादा  समाजवादी  होते...
लाहोर  की  शामे  और  भी  सुरमई  होती...
और  काम  के  सिलसिले  में  लोगों  का  कराची  आना  जाना  होता...
मेहदी  हसन  और  नुसरत  साब  की  आवाजें  हर  घर  में  गूंजती ...
पर  वक़्त  का  फरमान  कुछ  और  था...
और  फसल जो पहले  एक ही  खेत से  कटती  थी  अब  अलग अलग बाज़ारों में बेचीं जाती  है...
'Nuclear family' की  हवा  ने  देशों  को  भी  नहीं  छोड़ा...
जो  रोटी  पहले  एक  ही  चूल्हे   पर  पकती  थी , वो  अब  अलग  अलग  कमरों  में  बंद  दरवाज़ों  के  भीतर  बनती  है...
इश्वर-ओ-अल्लाह  भी  क्या  करते , के  खुदा  के  इस  बनाये  हुए  जहां  में  कुछ  लोग  खुद  खुदा  बन  गए  थे...
मैंने  बटवारे  को  देखा  नहीं  है  पर  आज  भी  सरहद  पर  उन  रूहों  की  चीख  सुनाई  देती  है.. 
जिनके  जिस्म  काटे  गए , इज्जत   लूटी  गयी , और  जिनको  बिछड़ने   पे  मजबूर  किया गया...
आज  भी  पंजाब   में  सड़ी  गली  लाशों  के  निशाँ  दिखाई  देते  है  जिनको  सड़क   पर  से  कुरेद  कर  निकाला  गया..
काश  आज  ये  दोनों  देश  एक  होते...
तो  इन  रूहों  को  चैन  मिलता..
अमन  की  सिर्फ  आशा  ही  नहीं  अमन  की  खुशबू  से  हर  कोना  महकता... 

बाज़ी....

ऐ  खुदा  चल  किसी  दिन  साहिल  पे  बैठ  के  ज़िन्दगी  की  बाज़ी  लगाये .. 
शतरंज  की  बिसात  पर  फैसला  करें  की  कोंन  ले  जाएगा  ज़िन्दगी  को... 
तू  अपनी  मर्ज़ी  से  मुश्किलें  बीछा  मेरी  राह  में...
मै  अपने  यकीन  से  उनको  पार  कर  लूँगा...
मेरे  वजूद  को  मिटाने  की  कोशिश  तू  जारी  रख...
मै  हर  एक  दिन  नया  जनम  लेके  फिर  आ  जाऊंगा ...
मेरे  हर  रिश्ते  को  बाज़ार  में  नीलाम  करदे...
मै  हर  एक  मोड़  पे  रिश्तों  को  महफूज़  कर  के  आगे  बढ़  जाऊंगा...
मेरे  सफ़र  के  हर  मोड़  पे  दो  राहें  पेश  कर...
मै  हर  बार  तजुर्बे  से  सही  राह  चुन  लूँगा...
दहकती  आग  लाके  रखदे, बर्फीली  हवाएं  चलवा...
जीने  की  तमन्ना  से  मै  हर  वार  को  सह  लूँगा...
और  जब  तू  आखरी  चाल  चलेगा  मौत  की...
तो  उसकी  तस्वीर  दिखा  कर  मौत  से  भी  बच  निकलूंगा...
यूँ  भी  होगा  इक  दिन...
और  फिर  ज़िन्दगी  मेरा  हात  थामकर  मुझसे  कहेगी  मुस्कुराकर...
चलो उठो  अभी  तो  बोहोत  सफ़र  बाकी  है...
यूँ  भी  होगा  इक  दिन.. ज़िन्दगी  फिर  चल  पड़ेगी...