Sunday, August 11, 2013

मुक्त

कभी कभी यूँ भी  हो के जिस्म से निकल कर भी में तुझे देख पाऊँ 
अभी तक अपने अन्दर ही देखा है तुझे अब के बाहर भी तुझे देख पाऊँ 
देख पाता मेरे चेहरे को जब तुम मुस्कुराती हो 
महसूस किया है होश खोते हुए मैंने उस वक़्त 
देख पाऊँ तुझे  अकेले में जब  गुनगुनाती हो 
और जब फ़ोन पर कहूँ के तुम सबसे हसीन हो 
तब तुझे अपने होंट दबाते देख पाता 
पर कमबख्त इस जिस्म में कैद हूँ किसी मुजरिम की तरह 
जितना निकलने की कोशिश करू  उतना ही जकड़ा जाता हूँ 
शायद अब मौत के बाद ही तुझमे घुल पाउँगा और मुक्त हो जाऊंगा 

खामोश....

कभी कभी यूँ ही खामोश रहने को दिल करता है.…
कोई सवाल पूछे तो बस हँस कर जवाब देने को दिल करता है….
ये नहीं की किसी बात पर खफा हूँ, या दिल दुखा है….
पर जिंदगी की इस सर्दी में खामोशी का कम्बल ओढ़े.…
वक़्त के इस अमर अलाव के पास बैठने को दिल करता है….
जेहेंन के इस मुसलसल शोर से तंग आ चूका हूँ.…
अपने वजूद को भुलाकर इस कायनात को बस देखने को दिल करता है.…
ज़िन्दगी की हकीकत कुछ और है ये जानता हूँ.…
पर  फिर भी ज़िन्दगी के इस झूट को गले लगा कर जीने को दिल करता है…. 

Monday, July 29, 2013

अरमान....

सुबह से एक गिद्ध मेरे घर के आस पास मंडरा रहा था
शायद कोई जानवर मर गया है आस पास…
पर न कोई गन्दी बू फिजा में न ही कौव्वो की कॉव कॉव
बड़ी आस से मेरे घर को देख रहा था, न जाने किस फ़िराक में था
घर में देखा तो कोई चूहा तक मरा नहीं था
कुछ देर बाद एक अजीब सी बदबू फैल गयी थी घर में

मेरा एक अरमान अभी अभी मर गया था
आँगन में उसकी लाश फ़ेंक दी थी मैंने
हाँ शायद उसी को नोच  नोच कर खाने आया होगा वो गिद्ध

Wednesday, May 1, 2013

कैफियत....

अब न कोई माज़ी  है न मुस्तकबिल
न कोई दर्द है न कोई मुदावा
न कोई ख्वाइश है  न ही कोई सपना
रिश्तों के सारे ताने बाने अब सुलझे है
ज़हन और जिस्म अब पराये लगते है 
बस सांस चलती है जिस्म के खाली कमरे में टिक टिक करते हुए
हर पल गुज़रते देख रहा हूँ वक़्त की बिसात पर
बस एक ही है सच्चाई इस पल की
जिसमे पूरा घुल गया हूँ
पूरा ब्रह्माण्ड जैसे एक ही पल का मोहताज है
हर पल बदलती है यह कायनात पर सच्चाई एक ही है
वही है परमात्मा वही है इश्वर वही है मुझमे 
बस एक ही सवाल है जो दिन रात सताता है
कौन हूँ मै?


Sunday, February 3, 2013

उस्ताद अमजद अली खान...

जब सरोद लेकर बैठते हो तो यूँ महसूस होता है
जैसे कोई योगी अपनी साधना कर रहा हो
और जब स्वर निकलता है तो जैसे दूर पहाड़ों पर अज़ान की आवाज़ गूंजे
जब किसी राग को बजाते बजाते आँखें बंद करके ऊपर देखते हो
तो जैसे गहरे ध्यान में जा रहे हो
अनगिनत गूंगे स्वरों को राग की शक्ल दी है तुमने
अनगिनत स्वरों को उनकी मंजिल देके मुक्त किया है
यूँ ही कभी कुछ गुनगुना लिया और कुछ देर बाद उसको एक राग में ढाल दिया
मौसिकी जैसे तुम्हारे अन्दर बसी है  है और सारा ब्रह्माण्ड उससे रोशन है
सरोद की दुनिया के लिए नेमत हो तुम
सरोद के मुहाफ़िज़ हो तुम...
मौसिकी का कोहिनूर हो तुम...

चाँद..


हर रोज़ वोह उसे देखने आता था
जब हर रात वोह छत पे आया करती थी....
और मुस्कुराकर अपनी जुल्फें संवारती थी
जब हलकी सी हवा चलती थी रात के आसमान पर...
आज न जाने क्यूँ वोह नहीं आई
रात भर उसे ढूँढ़ते ढूँढ़ते बहुत दूर चला आया था वोह..

देखो तो आज चाँद ज़मीं के कितने करीब आ गया है.....

Sunday, December 9, 2012

school...

मेरे घर के पास के स्कूल में हर रोज़ बच्चे गाते है
"मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना"
कल फिर शेहेर में मज़हबी फसाद हुआ है
न जाने आज कल स्कूल में बच्चों को क्या पढाया जाता है.....

तेरे शेहेर की शाम....

बोहोत दिनों बाद आज तेरे शेहेर की शाम मिली थी मुझसे  साहिल पे
वही शाम जिसको हम साथ में बैठके डूबते देखा करते थे
वही शाम जो हमारी सारी बातें चुपके से सुना करती थी
जब से तूने शेहेर छोड़ा है, बोहोत ही अफसुर्दा लगती है शाम
जो पहले किसी बच्चे की मुस्कान की तरह खिल उठती थी
अब बस आती है और रात की चादर डाल के आसमान पर, चली जाती है
सुना है सूरज भी अब रात में घर नहीं जाता
काश के कभी यूँ भी होता
हम दोनों किसी दिन फिर मिल पाते चोरी चोरी साहिल पे
और शाम को तुम्हारी आँखों में डूबते देख पाता
और हम दोनों सूरज को उसके घर तक छोड़ आते
बोहोत याद करती है तुमको तुम्हारे शेहेर की शाम....
गर किसी दिन आओ साहिल पे तो हाल चाल पूछते जाना....

 

Monday, August 27, 2012

कौन हूँ मै?...

किसी की नज़र में हैवान हूँ...
किसी की नज़र में भगवान् हूँ...
 कौन हूँ मै?

कोई कातिल कहता है मुझे...
किसी ने मुनसिफ बना रखा है...
किसी ने बांधली है उम्मीद मुझसे...
कोई हसता  है मेरी उम्मीद पर...
कभी किसी ने वली कह दिया...
बादाख्वार करार किया किसीने...
कौन हूँ मै?..

कोई हैरत से देखता है मुझे...
कोई देख के अनदेखा करता है...
कभी शायर हूँ, किसी पल में कायर भी..
कभी बस प्यार प्यार ही प्यार हूँ.. नफरत-ए-शमशीर भी..
कौन हूँ मै?...

कभी करता हूँ खुदा को सजदे...
कभी बुतखानो पे हँसता हूँ..
कभी गुजरी है रात मैकदों में..
कभी यूँ ही सड़कों पर सारी रात गुजारता हूँ..
कौन हूँ मै?

क्या मेरा भी कोई वजूद है?
या बस सांस हूँ मै ?
कोई नया रिश्ता बनता है तो सवाल और गहरा होता है..
सदियों से भटक रहा हूँ इस ज़मीन पर...
बस एक ही  सवाल है मुसलसल...
कौन हूँ मै?

Saturday, August 18, 2012

ग़ज़ल...

या खुदा ये तुने क्या कर दिया औरत को जिस्म दे के ...
नंगा किया जाता है जिसे हर चौराहे पर पैसे दे कर...

हर किसी की  आँख में एक शैतान बैठा है..
जिसको बस अपनी हवस मिटानी है प्यार का नाम दे कर..

कभी मजबूर बेबस हो कर तो कभी मज़े के लिए...
औरत ने इस ब्रह्माण्ड को जाना है सिर्फ जिस्मानी तौर पर...

नूर है ज़िन्दगी का औरत के जिस्म में...
इस बात को भूल कर क्यूँ है सब सेक्स का गिलाफ ओढ़ कर...

कई बरसों से उस दिन का कर रहा हूँ इंतज़ार 'पराशर'...
जब न कोई औरत हो न मर्द, हर कोई जी रहा हो इंसान बन कर...

 

Sunday, July 15, 2012

बौछार....

बोहोत देर बरसने के बाद जब बरसात थम जाती है...
तब मै अपने आँगन में लगे उस पेड़ से मिलने चला आता हूँ...
जो तुमने अपने हाथ से आँगन में लगाया था...
तेज़ हवा चलती है आँगन में, मानो धरती को सुखा रही हो...
अपने पत्तो और शाखों से पानी झटक कर...
मेरे चेहरे पर पानी की बूँदें फ़ेंकता है वोह पेड़...
 जैसे कोई परिंदा अपने परों से पानी निकालता है...
उस पल तुम्हारे होने का एहसास होता है...
जब तुम नहा कर निकलती थी और अपने बाल सुखाती थी...
तुम्हारे बालो से निकली कुछ महकती बूँदें मेरे चेहरे पे बरसती थी...
दरख्तों ने ये अदा तुमसे ही सीखी है..
पूरे कायनात की खूबसूरती समा गयी है तुम्हारे अन्दर...


Tuesday, March 27, 2012

कब्रिस्तान...

हर शाम जब मै सैर पे निकलता हूँ...
तो हर रोज़ मेरे घर के पास वाले कब्रिस्तान से होके गुज़रता हूँ...
एक छोटा सा शेहेर सा लगता है...
हर एक की कब्र है घरों की तरह..
और हर रोज़ बढ़ता हुआ नज़र आता है यह कब्रिस्तान...
जैसे मुंबई शेहेर हर रोज़ फैलता है...
एक बदबूदार खामोशी फैली है हवा में यहाँ...
बोहोत सारी लाशों का यह शेहेर है...
बोलता कुछ नहीं पर बोहोत आवाज़ करता है..
जब जिस्म को तुने नश्वर कहा था...
तो ये अजीब रिवाज क्यूँ है दफनाने का या खुदा...
और क्या कैफियत है तेरे इस जहां की...
जिन्दा इंसान को घर नहीं और कब्र मुफ्त में मिले...


एक दिन सोचता हूँ मै यूँ भी होगा...
यह आबादी का टाइम बम फूटेगा किसी दिन...
और हर जगह बस कब्रें ही नज़र आंएगी... 
क्या पता तब मेरे इस हिन्दुस्तान को कब्रिस्तान कह दे लोग....
 

फिल्म...

फिल्मे तो कई बन चुकी और कई बनेंगी...
पर असली फिल्म वो है जो ख़तम होते ही...
जिस्म-ओ-जान में घुल जाए जब कोई 'theatre' की सीढियां उतरे...
सीढियां उतरते उतरते जैसे उसका खुमार ज़हन पे चढ़ जाए...
जो रात में तकिये पे एक हलकी सी मुस्कान लाये...
तुम्हारे वजूद को टटोल कर कहीं दूर ले जाए...
और फिर धीरे धीरे ज़हन के कोने में जाके बस जाए...
और जब कभी मौका मिले तो अपनी छाप फिर जबान पे छोड़ जाए...
जैसे शोले फिल्म का कोई 'dialogue'...  

फिल्म वो नहीं जो सोचने पे मजबूर करे...
फिल्म वो है जो सोच में घुल जाए और हकीक़त को थोडा और फिल्मी बनाए...
 

Friday, March 23, 2012

दुआ...

सब कुछ बदल सा गया है...
और जो नहीं बदला वो अब नहीं है...
न जाने क्या कैफियत है... दुनिया तो वैसी ही लगाती है आज भी...
नज़र का फर्क है या ख़याल ने कोई नयी शक्ल ली है...
हवा बदन को छूती है तो बचपन में चला जाता हूँ...
जब माँ अपने गोदी में रख कर मुझको सुलाती थी...
हर शक्स से जैसे कोई गेहरा रिश्ता जुड़ गया है...
बेवजह की ख़ुशी पनपती है साँसों में...
कहीं काला जादू तो नहीं??
हर लम्हे में जैसे पूरा घुल गया हूँ... न कम न ज्यादा...
जिंदगी जैसे एक अटल निश्चय की तरह चलती है...
के अब और कोई उसे छेड़े तो खुद गिर जाए...
वो जो 'sense of humour' हुआ करता था...
कुछ रोज़ पहले ज़हन के कोने में फिर मिला है...
कुछ रिश्ते जो वक़्त की मार पड़ते पड़ते बूढ़े हो गए थे...
अब फिर दौड़ने लगे है...
वक़्त को मीलों में काटता हूँ... जो पहले पल की बैसाखी को पकड़ चलता था....
वो जो कुछ पल हुआ करते थे जिनको सारा दिन गुज़र जाने के बाद...
तकिये के कोने में खोल के महसूस करता था...
अब वोह जिंदगी की हकीकत में नज़र आते है...

न जाने किसकी दुआओं का असर है...
सुना है लोगो ने तुझे मस्जिद की तरफ जाते देखा था.....
 

Saturday, March 10, 2012

मै...

अक्सर सोचता हूँ के मै कौन हूँ...
इस जिस्म के कवच में जी रहा एक साँसों का दरिया हूँ?
या ख़याल के वजूद को हाथ में रख कर जी रहा कोई कर्म योगी हूँ?
देखता हूँ मेरे चारो तरफ तो हर चीज़ जैसे जिंदा है...
न पत्थर है मुर्दा न ये शाम-ओ-सेहेर बस चल रहे है...
कुछ तो वजह है जो यह सब है और सब चल रहा है...
कभी लगता है कोई खुदा है जिसने सब बनाया है..
पर न मैंने उसे देखा है न ही महसूस किया...
फिर क्यूँ मै यकीन करून खोकले विश्वास पर...
क्या मै जिस्म हूँ? क्या मै जेहेन हूँ?
पर देखता हूँ चारो तरफ तो एक जैसे है जिस्म-ओ-जेहेन..
एक से जज़्बात है एक सी ख़याल की शक्ल...
महसूस करता हूँ दुनिया को अपनी संवेदना से...
तो हर जिन्दा शय में मैंने बस मुझको ही पाया है...
हर चीज़ में बस मै हूँ... मै ब्रह्माण्ड हूँ...
मेरे ही जैसे सब है यहाँ सब के जैसा मै हूँ...
यह जिस्म-ओ-जेहेन भी मैंने ही बनाया...
बस एक है बनाने वाला जिसको हर इंसान में देखा है...
पूरे ब्रह्माण्ड की शक्ति का एक अंश हूँ मै...
हर जगह बस मै ही मै हूँ...
चारो तरफ बस मै हूँ....