Saturday, September 24, 2011

नज़्म...

एक नज़्म खो गयी है मेरी... 
मैंने लिख के रख दी थी कहीं...
धुंदली धुंदली याद आती है... अधूरी अधूरी सुनाई देती है...
किसीने चुरा ली है शायद... 
तेरा ज़िक्र था उसमे और खुशबू थी तुम्हारी आवाज़ की.. 
यादों के लिफाफों को खोल के देखा पर कहीं उसकी आहट नहीं थी...
किताबों की गलियों से गुज़रा तो पैरों के निशान तक नहीं थे....
बूढी हो गई थी, कुछ ही साल जिंदा रहती...
पर न जाने क्यों आज जेहेन के दरीचों से झांकती है...
ज्यादा गेहरा रिश्ता नहीं था उसके साथ...
पर आज जो बिछड़ा  हूँ  तो एक खलिश सी उभरी है दिल में...
हवाओं की तलाशी ली, खामोशी की छान बीन की...
अंधेरों से पूछा, उजालों को टटोल के देखा...
न जाने कहाँ खो गयी है...
फिर कल शब् जब तुम्हारे पास बैठा था...
तो तुम्हारे होटों पर छुप के बैठी थी वोह नज़्म...

इससे बेहतर भी उसका ठिकाना क्या होता..
मेरी हर नज़्म की इब्तेदा और इन्तहा तुम्ही से है.....

Tuesday, August 2, 2011

मुस्कुराहट....

मेरी  सोसाइटी  के  'basement' में  एक  छोटा  सा  परिवार  काम  करता  है...
मिया  बीवी  है  और  एक  बच्चा  जो  कभी  काम  में  हात  बटाता  तो  कभी  बोझ  लगता  है...
लोगो  के  कपड़ों  पर  जो  दौलत  और  शोहोरत  का  मैल  जम  जाता  है...
उसको  साफ़  करके  फिर  मैल चढाने  के  काबिल  बनाता  था  वोह  परिवार...
न  'career' की  महत्वकांक्षा  थी  न  इज्जत  का  खोकला  गुरुर...
पर  जब  भी  मिलते  थे  मुस्कुराते  थे  जैसे  खुदा  मुस्कुराता  है  बन्दों  पे...
दिन  भर  काम  करने  के  बाद,  बीवी  शाम  को  हर  घर  के  हिस्से  के  कपडे  देने  जाती  है...
जैसे  लोग  कोई  बड़े  हवन  पूजा  के  बाद  प्रशाद  बाटते  है...
सारे  बच्चे  किसी  सस्ते  खिलोने  की  तरह  देखते  थे  उस  बच्चे  की  तरफ...
पर  फिर  भी  घुल  मिल  के  खेलता  था  सब  के  बिच...
अभी  तक  उसने  औकाद  के  हिसाब  से  दोस्त  बनाना  सीखा  नहीं  था...
हर  रोज़  रात  को  घरों  से  बचा  हुआ  खाना  लेके  घर  को  लौटते  थे...
और  लौटते  हुए  अक्सर  मैंने  तीनो  को  एकसाथ  मुस्कुराते  हुए  देखा  है..
इस   उम्मीद   में  के  किसी  दिन  जिंदगी  हसीन  होगी 
जहां  बाकी  घरों  में  काम  के  बोझ  और  खोकले  रिश्ते  सांस  लेते  है...
कम  दीखते  है  ऐसे  लोग  जिनके  हालात  मजबूर  न  होके  खुद्दार  है...
दौलत  से  कमजोर  पर  मुस्कुराहट  और  उम्मीद  से  मजबूत..
जिंदगी  इतनी  भी  मुश्किल  नहीं  मुस्कुराने  को..
रूह  इतनी  भी  कम्जोर  नहीं  मर  जाने  को..

Monday, August 1, 2011

बारिश...

सुबह से एक काला बादल मेरा पीछा कर रहा था...
पीछा करते करते मेरे घर की खिड़की पे आके रुक गया...
किसी कुत्ते के पिल्ले की तरह जो अपनी माँ से बिछड़ गया हो...
न जाने क्या आरज़ू थी उसकी बड़ी आस लगा के ताकता रहा मुझको...
फिर एक हवा का झोंका आके मेरे कानो में चुपके से कह गया...
सावन का भटका बादल है उसे अपनी मंजिल तक पहुंचा दो...
फिर जब हवाओं पे पैर रखकर शाम उतरी...
तो मेरी हैरत की निगाह जो उस बादल पर थी मददगार हो उठी...
हवाओं के हाथों संदेसा भिजवाया उस बादल को...
की मेरे पीछे पीछे चलता रहे...
फिर जब चाँद निकला गोधुली में...
तो उस बादल को तेरे घर के ऊपर छोड़ आया था....
हर बादल की ख्वाहिश रहती थी तेरी छत पे बरसने की...
सुना है कल रात बारिश हुई थी सिर्फ तेरे ही घर पर जब तुम मुस्कुराती आँगन में आई थी...
खुदा का कोई करिश्मा समज कर लोगो ने शाम की नमाज़ तेरे दर पे ही अदा करदी...
बारिश भी दीवानी है तेरी...
बादलों का कम्बल ओढ़े किसी डाकू की तरह तुझे मुस्कुराता देखने चली आती है सावन में...


सावन...

कल रात के आखरी पहर में  दरवाज़े पे हुई दस्तक ने अचानक जगा दिया...
हवा का झोंका था जो दरवाज़े पे कुछ सब्ज़ पानी की बूँदें फ़ेंक गया था..

सुबह उठ के 'calendar' देखा तो सावन का महिना शुरू हो चूका था.... 

India Pakistan

अगर  इंडिया  और  पकिस्तान  आज  एक  होते..
तो  सचिन  तेंदुलकर  और  वसीम  अकरम  एक  ही  टीम  में  होते..
क्या  टीम  होती  वह  हर  विश्वकप  हम  ही  जीतते...
कश्मीर  की  पेशानी  पे  इतनी  चोटे  नहीं  होती...
हिन्दू  और  मुसलमानों  के  बदन  से  कॉमि  बदबू  नहीं  आती...
उर्दू  आज  भी  स्कूलों  में  पढाई  जाती...
'Bangalore' के  साथ  साथ  इस्लामाबाद  भी  'IT' में  आगे  होता..
न  टूटती  बाबरी  न  गोधरा  में  दंगा  भड़कता...
आतंकवादियों  से  ज्यादा  समाजवादी  होते...
लाहोर  की  शामे  और  भी  सुरमई  होती...
और  काम  के  सिलसिले  में  लोगों  का  कराची  आना  जाना  होता...
मेहदी  हसन  और  नुसरत  साब  की  आवाजें  हर  घर  में  गूंजती ...
पर  वक़्त  का  फरमान  कुछ  और  था...
और  फसल जो पहले  एक ही  खेत से  कटती  थी  अब  अलग अलग बाज़ारों में बेचीं जाती  है...
'Nuclear family' की  हवा  ने  देशों  को  भी  नहीं  छोड़ा...
जो  रोटी  पहले  एक  ही  चूल्हे   पर  पकती  थी , वो  अब  अलग  अलग  कमरों  में  बंद  दरवाज़ों  के  भीतर  बनती  है...
इश्वर-ओ-अल्लाह  भी  क्या  करते , के  खुदा  के  इस  बनाये  हुए  जहां  में  कुछ  लोग  खुद  खुदा  बन  गए  थे...
मैंने  बटवारे  को  देखा  नहीं  है  पर  आज  भी  सरहद  पर  उन  रूहों  की  चीख  सुनाई  देती  है.. 
जिनके  जिस्म  काटे  गए , इज्जत   लूटी  गयी , और  जिनको  बिछड़ने   पे  मजबूर  किया गया...
आज  भी  पंजाब   में  सड़ी  गली  लाशों  के  निशाँ  दिखाई  देते  है  जिनको  सड़क   पर  से  कुरेद  कर  निकाला  गया..
काश  आज  ये  दोनों  देश  एक  होते...
तो  इन  रूहों  को  चैन  मिलता..
अमन  की  सिर्फ  आशा  ही  नहीं  अमन  की  खुशबू  से  हर  कोना  महकता... 

बाज़ी....

ऐ  खुदा  चल  किसी  दिन  साहिल  पे  बैठ  के  ज़िन्दगी  की  बाज़ी  लगाये .. 
शतरंज  की  बिसात  पर  फैसला  करें  की  कोंन  ले  जाएगा  ज़िन्दगी  को... 
तू  अपनी  मर्ज़ी  से  मुश्किलें  बीछा  मेरी  राह  में...
मै  अपने  यकीन  से  उनको  पार  कर  लूँगा...
मेरे  वजूद  को  मिटाने  की  कोशिश  तू  जारी  रख...
मै  हर  एक  दिन  नया  जनम  लेके  फिर  आ  जाऊंगा ...
मेरे  हर  रिश्ते  को  बाज़ार  में  नीलाम  करदे...
मै  हर  एक  मोड़  पे  रिश्तों  को  महफूज़  कर  के  आगे  बढ़  जाऊंगा...
मेरे  सफ़र  के  हर  मोड़  पे  दो  राहें  पेश  कर...
मै  हर  बार  तजुर्बे  से  सही  राह  चुन  लूँगा...
दहकती  आग  लाके  रखदे, बर्फीली  हवाएं  चलवा...
जीने  की  तमन्ना  से  मै  हर  वार  को  सह  लूँगा...
और  जब  तू  आखरी  चाल  चलेगा  मौत  की...
तो  उसकी  तस्वीर  दिखा  कर  मौत  से  भी  बच  निकलूंगा...
यूँ  भी  होगा  इक  दिन...
और  फिर  ज़िन्दगी  मेरा  हात  थामकर  मुझसे  कहेगी  मुस्कुराकर...
चलो उठो  अभी  तो  बोहोत  सफ़र  बाकी  है...
यूँ  भी  होगा  इक  दिन.. ज़िन्दगी  फिर  चल  पड़ेगी...

Tuesday, June 21, 2011

ज़िन्दगी ऐ ज़िन्दगी...

 पहले जो आशना थी जिंदगी अब अनजान रहके चुप चाप देखती है...
दिन कुछ यूँ गुज़रते थे के बस तारीख उलटे...
अब दिन का एक पहर गुज़रता है तो जैसे शारीर से कोई बोझ उतरे..
ख्वाइशों को मजबूरियों ने कैद करके रक्खा है....
एक खला है जिस्म में पूरी फैली हुई...
दिल की धड़कन चुप चाप गूंजती रहती है इसमें जैसे किसी गिरजे की जरस...
कई सालों बाद धुप को ठहरते देखा है मैंने अपने आँगन में...
आरज़ू अपाहिज है अब चल नहीं पाती ख़याल तक भी...
दिन ऐसा गुज़रता है के कभी ढलेगा नहीं... और रात ऐसी आती है के कोई सुबह नहीं होगी...
दुआ भी अब खुदा तक नहीं पहुँचती.. सुना है कुछ आवारा परिंदे बिच में ही लूट लेते है...
बेकल बेसहारा है नज़र.. तुझको तलाशती है हर दम...
वक़्त जो पहले नज़र नहीं आता था गुज़रते हुए...
अब घर में हर कोने में उसके कतरे नज़र आते है...
कोई कतरा उठा लिया और बस गुज़ार लिया...

जिंदगी तू क्यूँ इस कदर रूठी है मुझसे...
पास आके बैठ बात कर.. मै भी तो तेरा अपना हूँ...
मुझे बोहोत कुछ देना है तुझको.. उसका वादा निभाना है...
आ जिंदगी मुहसे प्यार कर....
जिंदगी ऐ जिंदगी मुझसे प्यार कर...

Friday, June 17, 2011

बम्बई...

कई बार बारिश में मुंबई की सड़कों पे चलते चलते
जब मै किसी पुरानी मिल से होके गुज़रता हूँ...
बारिश की कुछ सब्ज़ बूँदें जब मिल की दीवारों से टकराती है...
तो कुछ कतरें मन पे आ गिरते है.. और मुझे माजी की उन खोयी गलियों में ले जाती है...
जब मुंबई को बम्बई के नाम से जाना जाता था...
और आस पास के कस्बों से लोग रोटी कमाने के बहाने इस शेहेर की आबादी में शामिल होते थे..
मिल मजदूर का नाम मिलता था.. और मशीनों सा काम मिलता था..
पहले कुछ महीने साथी मजदुर किसी दोस्त की तरह मदत करते थे.. 
किसी ने रोटी दे दी.. किसी ने सब्जी.. टुकड़े इकठ्ठा करके खाना मिलता था...
एक छोटा से "गाला" होता था.. जहां नींद भी शिफ्ट में मिलती थी...
हर किसी का एक छोटा सा कोना होता था.. और कपडे टांगने के लिए एक छोटी सी जगह...
हर कोई कुछ पूँजी जमाकर गाँव लौटने की तमन्ना रखता था...
मिल की वोह खट खट की आवाज़ शुरुवात में शोर की तरह सुनाई देती थी..
फिर जैसे वोह आवाज़ इन मजदूरों के जिस्म में घुल कर खामोशी बन जाती थी...
अब मिल की जगह "mall" बन गए है...
पर आज भी कोई बूढा मिल मजदूर मिल के पास से गुज़रता है..
तो उसके कानो में आज भी वोह आवाज़ गूंजती है...
इन्ही लोगों ने बम्बई को मुंबई बनाया है...
सजा कर दुल्हन को जैसे कोई विदा कर दे...
कई बार मैंने मुंबई में बम्बई को महसूस किया है..
अनोखा शेहेर है मुंबई...
जितना माजी में रोशन है उतना ही मुस्तकबिल में नज़र आता है...


Thursday, May 19, 2011

मुंबई और रात..

मैंने  मुंबई  को  बोहोत  करीब  से  देखा  है... 

रात  की  मेहबूबा  है  मुंबई..
रात  'underworld'  के  'don'  की  तरह  चुपके  से  मिलने  आती  है...
और  सुबह  होने  के  पहले  निकल  जाती  है..
उसे  डर  है  के  कही  सूरज  की  किरण  उसे  पकड़  न  ले....
मैंने  कई  बार  देखा  है  साहिल  पे  मुंबई  ko...
हात  में  फिल्म  की  दो  टिकेट  लेके  रात  का  इंतज़ार  करते  हुए...
उसकी  पसंदीदा  जगह  पे  खाना  खाते  है...
फिर  फिल्म  देखते  है  किसी  'typical mumbaikar' की  तरह...
फिर  जब  रात  अपने  दुसरे  पहर  से  गुज़रती  है..
तो  समंदर  के  बिस्तर  पे  दोनों  के  जिस्म  यूँ  मिल  जाते  है  जैसे  कभी  जुदा  न  थे..
एक  अजीब  सी  खामोशी  मचलती  है  शेहेर  में...
कुछ  देर  मुंबई  भी  सोती  है  जब  रात  सुस्ताने  लगे...
पर  रात  का  जाना  तो  तय  था...
चुपके  से  मुंबई  का  हात  अपने  बदन  से  उठाकर...
मुंबई का  माथा  चूमकर  रात  निकल  जाती  है...
कोई  नन्ही  सी  सबा  आकर  मुंबई  को  जगाती  है...
रात  फिर  कल  साथ  रहने  का  वादा  तोड़कर  चली  गयी...
कुछ  देर  यूँही  साहिल  पे  बैठी  रहती  है  मुंबई...
मैंने देखा है उसे गुमसुम उदास भी...
शायद  इसीलिए  सुबह  सुबह  मैंने  अक्सर  मुंबई  को  तनहा  देखा  है...
मुंबई  और  रात  का  यह  रोमांस  कई  सदियों  से  चला  आ  रहा  है....
मुंबई रात में उस बार बाला की तरह नज़र आती  है जो सज धज के किसी का इंतज़ार करती हो...
कई  बार  मुंबई  ने  कहा  रात  को  शादी  के  लिए...
पर  रात  भी  क्या  करती  उसका  विदेश  में  भी  तो  एक  परिवार  है....
मुंबई  को  न  जाने  कितने  लोगो  ने  धोका  दिया  है!!!!

Thursday, April 28, 2011

तेरी आँखें....

तेरी आँखें सब कुछ कहती है मुझसे....
तेरे मन का चेहरा बन रोज़ पलकों तले मिलती है मुझसे ..
आँख की कोर मे तैरती नमी में कुछ मजबूर अरमान मचलते नज़र आते है..
बात  करते  करते  मुझसे  जब  अचानक  नज़र  फेर  लेती  हो .. 
तो जिंदगी की किताब का वो बेरंग सा सफ्फ्हा चुपके से पलट देती हो...
खामोश बैठ के जब यूँ ही आसमान की तरफ देखती हो. ..
तो आसमान की तन्हाई तुम्हारी आँखों में उतर आती है...
कल जब सनसेट देखा था तुमने मुस्कुराके ..
तो शाम को तुम्हारे नैनो में ढलते देखा था...
और तुमने चुपके से अपनी आँखों में शाम को महफूज़ कर के रख दिया...
और चाँद को कहा कल ढलते ढलते मुझसे ले जाना...
जब खुल के हस्ती हो...
तो  एक  अजीब  सी  मासूमियत  भर  आती  है  आँखों में... 
और सारे माहौल में फ़ैल जाती है खुशबू की तरह...

कई बरसों से अपाहिज हूँ लफ़्ज़ों की बैसाखी पर...
आकर कभी आँखों से बात करो...
के ख़तम हो लफ़्ज़ों का ये शोर...

Wednesday, April 27, 2011

आसमान पे उम्र काटे...

चलो ना किसी दीन जब शाम जवान हो...
ख्वाहिशों के पर लगाके आसमान पे उड़ने चले...
परिंदों के झुण्ड के साथ आसमान की सैर करे...
फिर जब थक जाए तो बैठे किसी बादल पर...
और शाम की चाय पिए सूरज को ढलता देख ..
आसमान के कैनवास पर सुरमई शाम के रंगों से एक पेंटिंग बनाये....
उस हसीं जिंदगी की जो तुम्हारे दिल में है...
बिलकुल पाक और दिलकश...
फिर जब सूरज अलविदा कहदे और चाँद चमक  उठे...
तो चांदनी को सिरहाने रख कर लेटे रहे बादल पर....
और सुबह तक बस बातें करते रहे...
किसी पुरानी बात पे तुम्हारे लबों पर वही गुनगुनाती हसी आये....
और वोह बस आसमान पर गुनगुनाती रहे 'Background music' की तरह..
चलो ना इसी तरह एक उम्र काटें आसमान पर...
और जब वक़्त का कारवां ख़तम हो...
तो एक साथ अगले जनम में जमीं पे उतर आये...

Sunday, April 24, 2011

20 x 40 का कमरा...

वोह 20 x 40 का तुम्हारे घर पे जो  एक कमरा है..
अब सौंधी सी रौशनी से सजा है...
सारे घर के कमरे बड़े ही हैरत से तकते है उसको... जैसे किसी नई दुल्हन को घरवाले तकते है..
न जाने क्या बात है उसमे... 
सुकून को आराम है वहाँ...
दो किनारों पे जो तुमने रौशनी रखी है उसके दम पे जैसे उसकी साँसें चलती है...
कुछ बोहोत ही हलके और नाज़ुक लफ्ज़ घुमते है इस खामोश रौशनी में...
जिंदगी की हर शिकायत यहाँ आकर बड़ी ही छोटी लगती है...
किसी बुज़ुर्ग की तरह अपने तजुर्बे से सब ग़मों को खिंच लेता है और अपने दामन में समेट लेता है...
वोह रौशनी के स्त्रोत तुम्हे बड़ी ही नजाकत से तकते है...
तुम्हारी आँखें उस कमरे में गहनों की तरह चमकती है...
पर जब तुम उदास होती हो तो यह कमरा नाराज़ सा लगता है...
तुम्हारी हसी उसकी नब्ज़ है...
हर पल मुस्कुराते रहो के तुमसे ही ये कमरा रोशन है....

इश्क...

इश्क रास्तों पे यूँही नचवाता  है...
कभी होटों पे बेवजह रुक कर मुस्कुराता है...
ज़हन में ग़ज़ल बन कर गुनगुनाता है...
सुनसान सडको पे भटकाता है देर रात तक...
आँख की चमक बन रोशन करता है चेहेरे को...
अजनबियों से बात करवाता है...
आँखों में डूबोता है...
इबादत की आदत लगवाता है...
अजीब बीमारी है ये...
दर्द से ज्यादा एहसास का मजा देती है...





मातम...

कल रात उस सितारे की अचानक मौत हो गई...
जो चाँद से मोहब्बत करता था...
चाँद यह खबर सुन कर कुछ सुन्न सा चमकता रह गया...
रात भर अपने आप को यकीं दिलाने की कोशिश करता रहा के अब वोह नहीं है...
कल  चाँद को धरती को देर तक तकते देखा था मैंने...
न कोई आँसूं टपका कही न कोई चीख...
शायाद अबतक वोह बात दिल तक उसके उतरी नहीं...
जैसे जैसे सब बादलों को खबर मिली तो सफ़ेद लिबास पेहेन कर चाँद के घर पहुँच रहे थे...
उस दिन बोहोत से बादलों को आसमान पे शोक मनाते देखा था मैंने...
एक ही मुद्रा में खामोशी की सफ़ेद चादर ओढ़े हुए...
जाने वाले के ग़म में बहुत देर तक आंसू बहाते रहे...
हाँ कल दिन भर बारिश होती रही...
फिर कुछ देर बाद जो हवा चली तो सब उठ के अपने सफ़र पे चल पड़े...
यह सोचकर के अब घर वालों को अकेला छोड़ दो...
और आसमान साफ़ था और चाँद फिर अकेला आसमान पे भटकता रह गया...
उस रात मैंने चाँद को नहीं देखा आसमान पे, पर कुछ चीखें ज़रूर सुनी थी बिजली की...
कुछ लोगो ने देखा था चाँद को लम्बे सफ़र पे जाते...
शायद उसकी आस्तियां बहाने गया होगा आकाश गंगा की तरफ...

जिंदगी के साथ मौत का भी खेल सब जगह एक जैसा है...
मौत के बाद का मौन आसमान और जमीं पर एक जैसा लगता है.....


उम्र...

उन दोनों में अब छोटे बच्चे की तरह झगड़े होते है...
पुरानी बातों को लेकर अब मुस्कुराके ताने मारते है....
कुछ पुरानी आदतें जो पहले दिल को भाति थी....
अब एक दुसरे की शिकायत करने के काम आती है...
अपने पोते को पूछते है की हम दोनों में से कौन अच्छा लगता है...
वो बाज़ी मारके खुश होती है और वोह हर बार हारना चाहता है...
पहले जो इश्क ग़ज़लों में बयान होता है...
अब वोह बस इशारों में अदा हो जाता है...
'fitness' के बहाने निकलते है 'walk' पर...
पर असल में थोड़ी 'privacy' चाहते है जो अब घर पे बच्चों के साथ नहीं मिलती...
अक्सर दोनों को मैंने देखा है उस जगह पे जाते... 
जहां वो पहली बार मिले थे...
कभी अकेले में पुराने दिन याद करके थोड़ी  देर जवान होते है...
वक़्त जो पहले एक दुसरे के बाहों में कटता था...
अब एक दुसरे को दवाई लेने की याद देने में निकल जाता है...
रात को बिस्तर पर सोने से पहले कहते है की तुझसे से पहले तो मौत मेरा ही रास्ता काटेगी...
और जब करवट लेते है तो सहम जाते  है के तेरे बिना कैसे गुज़ारा होगा...


एक उम्र साथ बिता कर इश्क कितना मासूम हो जाता है...
थोडा नमकीन थोडा मीठा...
लफ़्ज़ों से परे पर खामोशी से रोशन.....